कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 6 नोट्स | जैव प्रक्रम कक्षा 10 विज्ञान | NCERT Class 10 Science Chapter 6 in HIndi | Class 10 Science Chapter 6 notes pdf – भाग 5

कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 6 नोट्स | जैव प्रक्रम कक्षा 10 विज्ञान | NCERT Class 10 Science Chapter 6 in HIndi | Class 10 Science Chapter 6 notes pdf – भाग 5 

इस पोस्ट में मैंने NCERT Class 10 Science Chapter 6 notes दिया हैं जिसके द्वारा अपना कक्षा 10 विज्ञान का नोट्स पूरा कर सकते हैं 
मनुष्य का उत्सर्जन तंत्र –

वृक्क मूत्रवाहिनी, मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग मिलकर उत्सर्जि तंत्र का निर्माण करते हैं। प्रत्येक वृक्का रीनल गती द्वारा रुधिर प्राप्त करता है।

वृक्क की संरचना :

मनुष्य में वृक्क गहरे लाल रंग का सेम के बीज के आकार का होता है। यह लगभग 10 Cm लम्बा, 5-6 Cm चौडा तथा 2.5 Cm मोटा होता है। वृक्क का भीतरी किनारा धसा हुआ तथा बाहरी किनारा उभरा हुआ होता है, इस धँसे हुए स्थान को हाइलस कहते हैं, यहाँ से मूत्रनलिका निकलती है।

वृक्क की आन्तरिक संरचना से स्पष्ट है कि बृक्क के भीतरी धसे हुए किनारे के मध्य में कीप के आकार की खोखली संरचना होती हैं जो संकरी होकर मूत्र नलिका का निर्माण करती है इसे Pelvis कहते हैं
वृक्क का शेष भाग ठोस होता है और दो भागों में वटा होता है।
1·) बाहरी, हल्के बैगनी रंग का परिधीय भाग।
2.) भीतरी गहरे रंग का केन्द्रीय भाग ।

नेफ्रान -:

प्रत्येक वृक्क नलिका एक लग्बी एवं अत्यधिक कुण्डलित नलिका है जिसके दो मुख्य भाग है
1 मैल्पीघी कोष : इसके दो भाग है इसमें प्यालेनुमा सरंचना बोमैन सम्पुट तथा इसकी गुहा में रक्त कोशिकाओं से बना कोशिकागुछ होता है।
2 . स्त्रावि नलिका : वोमैन सम्पुट के अतिरिक्त वृक्क नलिका का शेष भाग स्त्रावी नलिका कहलाता है, यह समीपस्थ कुण्डलित नलिका, हेनले लूप तथा दूरस्थ कुण्डलित नलिका में बटी होती है।
वृक्क नलिका का अन्तिमभाग संग्रह नलिका में खुलता है।

मूत्र निर्माण की क्रियाविधि (Mechanism of Urine formation) –

वृक्क नलिकाओं द्वारा मूत्र निर्माण में निम्न तीन प्रक्रियाएँ होती है
1 – परानिस्पंदन (udrafiltration): कोशिकागुच्छ में अभिवाही धमनिका की जो शाखा आती है उन कोशिकाओं की पतली दीवारों से रुधिर का प्लाज्मा इनकर बोमैन सम्पुट में आ जाता है। यह क्रिया परानिस्पंदन कहलाती है।
2- चयनात्मक पुनरावशोषण (salective suabserption) – नली के अन्दर आए हुए नेफ्रिक निस्यन्द से भोजन आदि स्त्रावी नलिका व कोशिकाओं की भित्ति से होकर वापस रुधिर में आ जाता है तथा कुछ जल भी वापस रुधिर में आ जाता है। यह क्रिया चयनात्मक पुनरवशोषण कहलाता है।
3- स्त्रावण (decretion): अनावश्यक जल एवं व्यर्थ या हानिकारक पदार्थ स्त्रावी नलिका के तरल में ही रह जाते है इसे मूत्र कहते है। यह मूत्र संग्रह नलिका से होता हुआ मूत्राशय में एकत्र होता रहता है जो समय-2 पर शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।

प्रकाश संश्लेषण क्या हैं ? (phatosynthesis) –

सूर्य के प्रकाश में पौधों के हरे भागों में उपस्थित क्लोरोफिल की सहायता से CO2 व जल के संयोग से शर्करा आदि कार्बोहाइड्रेट के बनने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते है।
प्रकाश संश्लेषण की क्रियाविधि – यह दो चरणों में सम्पन्न
होती है।
1- प्रकाशीय अभिक्रिया – प्रकाश अभिक्रिया का अध्ययन सबसे पहले हिल नामक वैज्ञानिक ने किया था। यह क्रिया निम्न दो पदों में पूरी होती है।
 क्लोरोप्लास्ट के ग्रेनम में उपस्थित क्लोरोफिल सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर सक्रिय हो जाता है। ऊर्जायुक्त क्लोरोफिल द्वारा जल का प्रकाश अपघटन होता है।

मुक्त हाइड्रोजन आयन से उत्तेजित इलेक्ट्रान्स निकलते हैं जो ऊर्जा को ATP के रूप में मुक्त करते हैं।
इस क्रिया में भी आयन NADP को NADPH2 में उपचपित करते हैं। ADP से ATP के निर्माण को फोटोफॉस्फोरिलेशन कहते हैं।
2. अप्रकाशीय अभिक्रिया अथवा केल्विन चक्र -: इस अभिक्रिया में प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। इसकी खोज ब्लैकमैन ने की इस आधार पर इसे प्लैकमैन अभिक्रिया कहते है।

समस्त क्रिया रिबूलोश वाइफास्फेट की उपस्थिति में एक चक्र के रूप में होती है, जिसे केल्विन चक्र कहते हैं । यह अभिक्रिया निम्न चरणों में होती है
1·) 5 कार्बन वाले यौगिक रिबुलोस वाइफास्फेट के साथ CO 2 के 6 अणु मिलकर एक 6 कार्बन युक्त अस्थायी यौगिक का निर्माण करते है।
2.) यह अस्थायी यौगिक शीघ्र अपंचयित होकर फास्फोग्लिसरिक (PGA) अग्ल बना लेता है।
3.) PGA अणु अपंचयित होकर फास्फोग्लिसरेल्डिहाइड (PGAL) का निर्माण करते हैं।
4) PGAL के दो अणु मिलकर अपचयन के द्वारा शर्करा का निर्माण करते है तथा 10 अणु रिबुलोस बाईफास्फेट की पुन: उपपत्ति करते है।
अतः यह चक्र अभिक्रियाओं को चलाने के लिए फिर से तैयार होता है।
प्रयोग द्वारा सिद्ध है कि प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाई ऑक्साइड आवश्यक है।

NCERT Class 10 Science Chapter 6
NCERT Class 10 Science Chapter 6
वाष्पोत्सर्जन –

पौधों के वायवीय भागों से जल का वाष्प बनकर उड़ना वास्पोत्सर्जन या उत्स्वेदन कहलाता हैं प्रकार – पौधों में वाष्पोत्सर्जन निम्न प्रकार का होता है।

1.) रुध्रीय वाष्पोत्सर्जन : पत्तियों, हरे तनों तथा कुछ रुपान्तरित तनों की सतह पर असंख्य छोटे-छोटे रंध्र होते हैं इनके द्वारा पादप कोशिकाओं को श्वसन के लिए ऑक्सीजन मिलती है लगभग 80% वाष्पोत्सर्जन रंध्रो द्वारा होता है।
2.) उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन : पौधों का भाग व पत्तियाँ उपत्वचा पा कयूटिकल की परत द्वारा ढके होते हैं। इनसे भी वाष्पीकरण द्वारा जल उड़ता है उसे उपत्वपीप वास्पोत्सर्जन कहते हैं।
3.) वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन : वृक्षों के तनों व शाखाओं पर छाल में बीच-बीच में छोटे-छोटे वातन्ध्र होते हैं इनमें भी कुछ जलवास्प विसरित हो जाती है इसे वातन्त्रीय बाष्पोत्सर्जन कहते है।
पाण्पोत्सर्जन का महत्व निम्नवत् है –
1- अतिरिक्त जल का निस्तारण : वाष्पोत्सर्जन द्वारा अनावश्यक तथा अतिरिक्त जल पौधों के शरीर से बाहर निकलता रहता है।
2- खनिज लवणों की प्राप्ति : पौधों द्वारा जितना अधिक जल का अवशोषण होता है उतने ही अधिक खनिज लवण इसमें घुलकर पौधों के शरीर में पहुंचते हैं।
3- जल का समान वितरण : वाष्पोत्सर्जन द्वारा पौधों के सभी भागों में पानी का वितरण समान रूप से होता है।

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