यूपी बोर्ड कक्षा 12 सामान्य हिंदी भाग्य और पुरुषार्थ – Up Board Class 12th Hindi Bhagya Aur Purusharth

यूपी बोर्ड कक्षा 12 सामान्य हिंदी भाग्य और पुरुषार्थ – Up Board Class 12th Hindi Bhagya Aur Purusharth

यूपी बोर्ड कक्षा 12 सामान्य हिंदी भाग्य और पुरुषार्थ - Up Board Class 12th Hindi Bhagya Aur Purusharth

क) भाग्य को भी मैं इसी तरह मानता हूँ । वह तो विधाता का ही दूसरा नाम हुआ कि उदय हो । यानी भाग्य के उदय का प्रश्न सदा हमारी अपनी अपेक्षा से है । धरती का रुख सूरज की तरफ हो जाए , यही उसके लिए सूर्योदय है । ऐसे ही मैं मानता हूँ कि हमारा मुख सही भाग्य की तरफ हो जाए तो इसी को भाग्योदय कहना चाहिए ।
पुरुषार्थ को इसी जगह संगति है अर्थात् भाग्य को कहीं से खींचकर उदय में लाना नहीं , न अपने साथ ही ज्यादा खींचतान करनी है । सिर्फ मुँह को मोड़ लेना है । मुख हम हमेशा अपनी तरफ रखा करते हैं । अपने से प्यार करते हैं , अपने ही को चाहते हैं । अपने को आराम देते हैं , अपनी सेवा करते हैं । दूसरों को अपने लिए मानते हैं , सब कुछ को अपने अनुकूल चाहते हैं । चाहते यह हैं कि हम पूजा और प्रशंसा के केन्द्र हों और दूसरे आस – पास हमारे इसी भाव में मँडराया करें । इस वासना से हमें छुट्टी नहीं मिल पाती ।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए ।

प्र.1. प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।

उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘ गद्य गरिमा ‘ में संकलित जैनेन्द्र कुमार
द्वारा लिखित ‘ भाग्य और पुरुषार्थ ‘ शीर्षक निबन्ध से उद्धृत है ।

प्र.2. रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

उत्तर- लेखक कहता है कि मनुष्य सदैव पूजा व प्रशंसा का पात्र बने रहना चाहता है , इसके साथ ही वह चाहता है कि अन्य मनुष्य उसके आस – पास इसी भाव से घूमते रहें कि वे उसके सेवक हैं । इस प्रकार की वासना में मनुष्य हमेशा फँसा रहता है तथा इससे मुक्त नहीं हो पाता ।

प्र.3. ‘ वह तो विधाता का ही दूसरा नाम है । ‘ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति का आशय यह है कि जिस प्रकार ईश्वर सबके हृदय की बात
जानते हैं तथा प्रत्येक काल एवं स्थान पर विद्यमान रहते हैं , उसी प्रकार भाग्य
भी हर समय विद्यमान रहता है । इसलिए लेखक ने भाग्य कों विधाता का
दूसरा नाम बताया है ।

प्र.4. लेखक ने भाग्योदय की तुलना किससे की है और क्यों ?

उत्तर- लेखक ने भाग्योदय की तुलना सूर्योदय से की है , जिस प्रकार सूर्य का उदय नहीं होता है , वह तो अपने स्थान पर स्थिर रहता है । पृथ्वी का उसके आस – पास चक्कर लगाते हुए उसका मुँह सूर्य की ओर हो जाता है , तब हम उसे सूर्योदय कहते हैं । ठीक इसी प्रकार जिस समय निरन्तर कर्म करते हुए मनुष्य का मुख भाग्य की ओर हो तो उसे भाग्योदय कहना चाहिए ।

प्र.5. व्यक्ति कब अपने स्वार्थों के वशीभूत हो जाते हैं ?

उत्तर- व्यक्ति जब अपने नजरिए से जीवन को देखते हैं , स्वयं से प्रेम करते हैं , अपने लिए जीते हैं , अपनी ही सेवा में लगे रहते हैं तथा दूसरे व्यक्तियों को अपना सेवक मानते हुए सभी कुछ अपने अनुकूल बनाना चाहते हैं । तब वे स्वार्थों के वशीभूत हो जाते हैं ।

ख) इसलिए मैं मानता हूँ कि दुःख भगवान का वरदान है । अहं और किसी औषध से गलता नहीं , दु : ख ही भगवान का अमृत है । वह क्षण सचमुच ही भाग्योदय का हो जाता है , अगर हम उसमें भगवान की कृपा को पहचान लें । उस क्षण यह सरल होता है कि हम अपने से मुड़ें और भाग्य के सम्मुख हों । बस इस सम्मुखता की देर है कि भाग्योदय हुआ रखा है । असल में उदय उसका क्या होना है , उसका आलोक तो कण – कण में व्याप्त सदा – सर्वदा है ही । उस आलोक के प्रति खुलना हमारी आँखों का हो जाए बस उसी की प्रतीक्षा है । साधना और प्रयत्न सब उतने मात्र के लिए हैं । प्रयत्न और पुरुषार्थ का कोई दूसरा लक्ष्य मानना बहुत बड़ी भूल करना होगा , ऐसी चेष्टा व्यर्थ सिद्ध होगी ।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए ।

प्र.1- प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।

उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुरतक ‘ गद्य गरिमा ‘ में संकलित जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित ‘ ‘ भाग्य और पुरुषार्थ ‘ शीर्षक निबन्ध से उद्धृत है ।

प्र.2- रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

उत्तर- लेखक कहता है कि मैं मानता हूँ कि दुःख भगवान के वरदान के समान है । सफलता प्राप्त करने के पश्चात् मनुष्य के भीतर अहंकार का भाव उत्पन्न हो जाता है , वह घमण्ड करने लगता है । मनुष्य का घमण्ड किसी अन्य औषधि ( दवा ) से समाप्त नहीं होता । इसके लिए दुःख ही सबसे बड़ी औषधि ( दवा ) है । वह भगवान के अमृत के समान है ।

प्र.3- लेखक ने दुःख को ईश्वर का वरदान क्यों माना है ?

उत्तर- लेखक दुःख को ईश्वर का वरदान मानते हैं , क्योंकि सफलता प्राप्त करने के पश्चात् मनुष्य के भीतर अहंकार का भाव उत्पन्न हो जाता है , जो किसी अन्य औषधि से समाप्त नहीं होता । इसके लिए दुःख ही सबसे बड़ी औषधि है , जो ईश्वर के अमृत के समान होती है ।

प्र.4- लेखक के अनुसार व्यक्ति के भाग्योदय का क्षण कौन – सा होता है ?

उत्तर- जब किसी व्यक्ति के जीवन में दुःख आता है , तो वह अहंकार के भाव से मुक्त
होकर , स्वार्थ भावों से ऊपर उठकर निरन्तर कर्म करते हुए ईश्वर के समीप आता है । लेखक के अनुसार यही व्यक्ति के भाग्योदय का क्षण होता है ।

प्र.5- असल में उदय उसका क्या होना है , उसका आलोक तो कण – कण में व्याप्त सदा सर्वदा है ही ‘ का आशय स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति का आशय यह है कि भाग्य सदैव उदित रहता है अर्थात् भाग्य का प्रकाश सदैव विद्यमान रहता है । इसलिए भाग्य उदय होने का समय आएगा ऐसा कहना अनुचित है , क्योंकि वह तो सदैव विद्यमान रहता है । भाग्य के उदय का प्रकाश कण – कण में व्याप्त है ।

ग) पुरुषार्थ वह है , जो पुरुष को सप्रयास रखे , साथ ही सहयुक्त भी रखे । यह जो सहयोग है , सच में पुरुष और भाग्य का ही है । पुरुष अपने अहं से वियुक्त होता है , तभी भाग्य से संयुक्त होता है । लोग जब पुरुषार्थ को भाग्य से अलग और विपरीत करते हैं तो कहना चाहिए कि वे पुरुषार्थ को ही उसके अर्थ से विलग और विमुख कर देते हैं । पुरुष का अर्थ क्या पशु का ही अर्थ है ? बल – विकास तो पशु में ज्यादा होता है । दौड़ – धूप निश्चय ही पशु अधिक करता है , लेकिन यदि पुरुषार्थ पशु चेष्टा के अर्थ से कुछ भिन्न और श्रेष्ठ है तो इस अर्थ में कि वह केवल हाथ – पैर चलाना नहीं है , न क्रिया का वेग और कौशल है , बल्कि वह स्नेह और सहयोग भावना है । सूक्ष्म भाषा में कहें तो उसकी अकर्तव्य – भावना है ।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए ।

प्र.1- प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक कौन हैं ?

उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश ‘ भाग्य और पुरुषार्थ ‘ पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक ‘ जैनेन्द्र कुमार ‘ हैं ।

प्र.2- रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

उत्तर- लेखक का मानना है कि पुरुष अपने भाग्य से तभी जुड़ता है , जब वह अपने अहं को त्याग देता है । यही कारण है कि पुरुषार्थ से भाग्य को अलग करने का अर्थ पुरुषार्थ को उसके अर्थ से ही अलग करना है । पुरुषार्थ और भाग्य को अलग नहीं किया जा सकता ।

प्र.3- पुरुषार्थ को भाग्य से अलग क्यों नहीं किया जा सकता है ?

उत्तर- लेखक के अनुसार जहाँ पुरुष होता है वहाँ कर्मशीलता होती है और जहाँ कर्मशीलता है , वहाँ भाग्य होता है , इसलिए पुरुषार्थ से भाग्य को अलग करने का अर्थ पुरुषार्थ को उसके अर्थ से अलग करना होता है । अतः पुरुषार्थ को भाग्य से अलग नहीं किया जा सकता ।

प्र.4- पुरुषार्थ एवं बल में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- पुरुषार्थ एवं बल में कोई सम्बन्ध नहीं होता है । बल क्रिया का वेग एवं कौशल होता है जो पशुओं में अधिक होता है , किन्तु पुरुषार्थ , स्नेह एवं सहयोग की भावना के साथ अन्य व्यक्तियों के साथ अन्तःक्रिया में संलग्न होता है ।

प्र.5- ‘ पुरुषार्थ ‘ का शब्दार्थ क्या है ?

उत्तर- ‘ पुरुषार्थ ‘ का अर्थ व्यक्ति के प्रयत्न और सहयोगशील होने से है । पुरुषार्थ के लिए अहंकार का त्याग तथा स्नेह एवं सहयोग के साथ मिल – जुलकर कार्य करना आवश्यक है ।

घ) इच्छाएँ नाना हैं और नाना विधि हैं और उसे प्रवृत्त रखती हैं । उस प्रवृत्ति से वह रह – रहकर थक जाता है और निवृत्ति चाहता है । यह प्रवृत्ति और निवृत्ति का चक्र उसको द्वन्द्व से थका मारता है । इस संसार को अभी राग – भाव से वह चाहता है कि अगले क्षण उतने ही विराग – भाव से वह उसका विनाश चाहता है । पर राग – द्वेष की वासनाओं से अन्त झुंझलाहट और छटपटाहट ही उसे हाथ आती है । ऐसी अवस्था में उसका सच्चा भाग्योदय कहलाएगा अगर वह नत – नम्र होकर भाग्य को सिर आँखों लेगा और प्राप्त कर्त्तव्य में ही अपने पुरुषार्थ की इति मानेगा ।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए ।

प्र.1- प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।

उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘ गद्य गरिमा ‘ में संकलित जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित ‘ भाग्य और पुरुषार्थ ‘ शीर्षक निबन्ध से उद्धृत है ।

प्र.2- रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

उत्तर- लेखक कहता है कि इस संसार में मनुष्य की अनेक प्रकार की इच्छाएँ होती हैं , साथ ही अनेक प्रकार के नियम भी होते हैं , जो मनुष्य को इस संसार में लीन रखते हैं । वह अपनी इच्छापूर्ति के लिए आसक्त होकर कार्य करने में लगा रहता है । इस संसार में रहकर तथा सांसारिक कार्यों में लीन रहते – रहते मनुष्य थक जाता है

प्र.3- प्रवृत्ति – निवृत्ति के चक्र में फँसा मनुष्य क्यों थक जाता है ?

उत्तर- मनुष्य की विविध इच्छाएँ एवं आकांक्षाएँ होती हैं । वह अपनी इच्छा पूर्ति के लिए आसक्त होकर कार्य करते हुए थक जाता है और तब वह सांसारिक सुखों को त्यागना चाहता है । इस तरह संघर्ष करते हुए प्रवृत्ति – निवृत्ति का चक्र मनुष्य को थका देता है ।

प्र.4- राग – द्वेष की भावनाओं से अन्त में झुंझलाहट और छटपटाहट ही उसे हाथ आती है पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- ‘ राग – द्वेष की भावनाओं से अन्त में झुंझलाहट और छटपटाहट ही उसे हाथ आती है ‘ पंक्ति का आशय यह है कि मनुष्य इस संसार से प्रेम – भाव रखते हुए उसे चाहता है , किन्तु अगले ही क्षण ईर्ष्या के वशीभूत होकर इस संसार को नष्ट करना चाहता है । इस प्रकार प्रेम और ईर्ष्या की वासनाओं में पड़कर व्यक्ति झुंझलाहट एवं छटपटाहट की स्थिति में आ जाता है ।

प्र.5- लेखक के अनुसार मनुष्य का सच्चा भाग्योदय कब सम्भव है ?

उत्तर- जब मनुष्य नम्रता से झुककर कर्तव्यों के निर्वाह में पुरुषार्थ को पूर्ण मानेगा , तभी लेखक के अनुसार मनुष्य का सच्चा भाग्योदय सम्भव है । जिससे मनुष्य सफलता की ऊँचाइयों को छू सकता है ।

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